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नमो नमो मोर्चा की परदेश अध्यक्ष श्रीमती वनिता कासनियां पंजाब

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वनिता कासनियां पंजाब सहायता केंद्र vnitakasnia @mail.com नित्य लाइव दर्शन एवं साधना 👉 🚩जय श्री राम🚩जय श्री हनुमान Shri। Hanuman Chalisa By वनिता कासनियां पंजाब? ।। जय श्री सीताराम जी ।। दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो जस गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।। सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिगपाल जहां ते। कबि कोबिद कहि सके कहां ते।। तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राज पद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना। लंकेस्वर भए सब जग जाना।। जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।। दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।। सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डर ना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीनों लोक हांक तें कांपै।। भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।। संकट तें हनुमान छुड़ावै। मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिन के काज सकल तुम साजा। और मनोरथ जो कोई लावै। सोइ अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।। साधु-संत के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता। अस बर दीन जानकी माता।। राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम-जनम के दुख बिसरावै।। अन्तकाल रघुबर पुर जाई। जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।। संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जै जै जै हनुमान गोसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।। जो सत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महा सुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।। तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।। दोहा : पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप। राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।

  वनिता कासनियां पंजाब    सहायता केंद्र      vnitakasnia @mail.com नित्य लाइव दर्शन एवं साधना 👉 🚩जय श्री राम 🚩जय श्री हनुमान Shri।  Hanuman Chalisa By वनिता कासनियां पंजाब? ।। जय श्री सीताराम जी ।। दोहा : श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार। बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।। चौपाई : जय हनुमान ज्ञान गुन सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।। महाबीर बिक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन बिराज सुबेसा। कानन कुंडल कुंचित केसा।। हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।। संकर सुवन केसरीनंदन। तेज प्रताप महा जग बन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।। प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा।। भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे।। लाय सजीवन लखन जियाये। श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।। रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।...

🚩🪴राष्ट्र हिन्दू 🪴🚩 करवा चौथ पर महिलायें सोलह श्रृंगार करती है, वह 16 श्रंगार की कौन से होते है? By वनिता कासनियां पंजाब महिलाएं केवल करवा चौथ पर ही 16 श्रृंगार नहीं करती। भारत में महालक्ष्मी व्रत, दीपावली, विवाह आयोजन ओर शुभ मंगल कार्यों के दौरान भी 16 श्रंगार करती हैं।स्त्री जातक, स्त्री सुबोधनी, हरिवंश पुराण, श्रंगार शतक आदि पुस्तकों में स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक सोलह श्रंगारों की चर्चा की गई है।स्त्रियों के 16 श्रृंगार एवं उसका महत्व हिन्दू महिलाओं के लिए 16 श्रृंगार का विशेष महत्व हैस्त्री के 16 श्रंगार 16 कला, ॐकार की 16 मात्रा ओर षोड़स मातृका का प्रतीक हैं।स्त्रियों के 16 श्रृंगार कौन से हैंविवाह के बाद स्त्री इन सभी चीजों को अनिवार्य रूप से धारण करती है। हर एक चीज का अलग महत्व है।हर स्त्री चाहती थी की वे सज धज कर सुन्दर लगे। यह उनके रूप को ओर भी अधिक सौन्दर्यवान बना देता है।श्रंगार से पूर्व महिलाएं हल्दी, केशर आदि का उबटन लगाकर शरीर की शुद्धि करती हैं।प्राचीन जाल में रानी, अमिरिन की पत्नियां कुंकुमादि तेल से शरीर की मालिश करती थीं।पहला श्रृंगार: बिंदीसंस्कृत भाषा के बिंदु शब्द से बिंदी की उत्पत्ति हुई है। भवों के बीच रंग या कुमकुम से लगाई जाने वाली भगवान शिव के तीसरे नेत्र का प्रतीक मानी जाती है।सुहागिन स्त्रियां कुमकुम या सिंदूर से अपने ललाट पर लाल बिंदी लगाना जरूरी समझती हैं। इसे परिवार की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।दूसरा श्रृंगार: सिंदूरसिंदूर उत्तर भारत में लगभग सभी प्रांतों में सिंदूर को स्त्रियों का सुहाग चिन्ह माना जाता है और विवाह के अवसर पर पति अपनी पत्नी के मांग में सिंदूर भर कर जीवन भर उसका साथ निभाने का वचन देता है।तीसरा श्रृंगार: काजलकाजल आँखों का श्रृंगार है. इससे आँखों की सुन्दरता तो बढ़ती ही है, काजल दुल्हन और उसके परिवार को लोगों की बरी नजर से भी बचाता है।चौथा श्रृंगार: मेहंदीमेहंदी के बिना सुहागन का श्रृंगार अधूरा माना जाता है। शादी के वक्त दुल्हन और शादी में शामिल होने वाली परिवार की सुहागिन स्त्रियां अपने पैरों और हाथों में मेहंदी रचाती है।ऐसा माना जाता है कि नववधू के हाथों में मेहंदी जितनी गाढ़ी रचती है, उसका पति उसे उतना ही ज्यादा प्यार करता है ।पांचवां श्रृंगार:शादी का जोड़ा उत्तर भारत में आम तौर से शादी के वक्त दुल्हन को जरी के काम से सुसज्जित शादी का लाल जोड़ा (घाघरा, चोली और ओढ़नी) पहनाया जाता है।पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में फेरों के वक्त दुल्हन को पीले और लाल रंग की साड़ी पहनाई जाती है। इसी तरह महाराष्ट्र में हरा रंग शुभ माना जाता है और वहां शादी के वक्त दुल्हन हरे रंग की साड़ी मराठी शैली में बांधती हैं।छठा श्रृंगार: गजरादुल्हन के जूड़े में जब तक सुगंधित फूलों का गजरा न लगा हो तब तक उसका श्रृंगार फीका सा लगता है।दक्षिण भारत में तो सुहागिन स्त्रियां प्रतिदिन अपने बालों में हरसिंगार के फूलों का गजरा लगाती है।सातवां श्रृंगार : मांगटीका मांग के बीचों-बीच पहना जाने वाला यह स्वर्ण आभूषण सिंदूर के साथ मिलकर वधू की सुंदरता में चार चांद लगा देता है। ऐसी मान्यता है कि नववधू को मांग टीका सिर के ठीक बीचों-बीच इसलिए पहनाया जाता है कि वह शादी के बाद हमेशा अपने जीवन में सही और सीधे रास्ते पर चले और वह बिना किसी पक्षपात के सही निर्णय ले सके।आठवां श्रृंगारः नथनाक की नथ विवाह के अवसर पर पवित्र अग्नि में चारों ओर सात फेरे लेने के बाद देवी पार्वती के सम्मान में नववधू को नथ पहनाई जाती है।कहते हैं कि सुहागिन स्त्री के नथ पहनने से पति के स्वास्थ्य और धन-धान्य में वृद्धि होती है।उत्तर भारतीय स्त्रियां आमतौर पर नाक के बायीं ओर ही आभूषण पहनती है, जबकि दक्षिण भारत में नाक के दोनों ओर नाक के बीच के हिस्से में भी छोटी-सी नोज रिंग पहनी जाती है, जिसे बुलाक कहा जाता है। नथ आकार में काफी बड़ी होती है इसे हमेशा पहने रहना असुविधाजनक होता है, इसलिए सुहागन स्त्रियां इसे शादी-व्याह और तीज-त्यौहार जैसे खास अवसरों पर ही पहनती हैं, लेकिन सुहागिन स्त्रियों के लिए नाक में आभूषण पहनना अनिर्वाय माना जाता है। इसलिए आम तौर पर स्त्रियां नाक में छोटी नोजपिन पहनती हैं, जो देखने में लौंग की आकार का होता है। इसलिए इसे लौंग भी कहा जाता है।नौवां श्रृंगारः कर्णफूलकान में पहने जाने वाला यह आभूषण कई तरह की सुंदर आकृतियों में होता है, जिसे चेन के सहारे जुड़े में बांधा जाता है। विवाह के बाद स्त्रियों का कानों मे कणफूल (ईयरिंग्स) पहनना जरूरी समझा जाता है। इसके पीछे ऐसी मान्यता है कि विवाह के बाद बहू को दूसरों की, खासतौर से पति और ससुराल वालों की बुराई करने और सुनने से दूर रहना चाहिए।दसवां श्रृंगारः हारगले में पहना जाने वाला सोने या मोतियों का हार पति के प्रति सुहागन स्त्री के वचनवद्धता का प्रतीक माना जाता है।हार पहनने के पीछे स्वास्थ्यगत कारण हैं। गले और इसके आस-पास के क्षेत्रों में कुछ दबाव बिंदु ऐसे होते हैं जिनसे शरीर के कई हिस्सों को लाभ पहुंचता है। इसी हार को सौंदर्य का रूप दे दिया गया है और श्रृंगार का अभिन्न अंग बना दिया है।दक्षिण और पश्चिम भारत के कुछ प्रांतों में वर द्वारा वधू के गले में मंगल सूत्र पहनाने की रस्म की वही अहमियत है।ग्यारहवां श्रृंगार: बाजूबंदकड़े के सामान आकृति वाला यह आभूषण सोने या चांदी का होता है। यह बाहों में पूरी तरह कसा जाता है। इसलिए इसे बाजूबंद कहा जाता है।पहले सुहागिन स्त्रियों को हमेशा बाजूबंद पहने रहना अनिवार्य माना जाता था और यह सांप की आकृति में होता था। ऐसी मान्यता है कि स्त्रियों को बाजूबंद पहनने से परिवार के धन की रक्षा होती और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।बारहवां श्रृंगार: कंगन और चूड़ियांसोने का कंगन अठारहवीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से ही सुहाग का प्रतीक माना जाता रहा है।हिंदू परिवारों में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है कि सास अपनी बड़ी बहू को मुंह दिखाई रस्म में सुख और सौभाग्यवती बने रहने का आशीर्वाद के साथ वही कंगन देती थी, जो पहली बार ससुराल आने पर उसे उसकी सास ने उसे दिये थे। इस तरह खानदान की पुरानी धरोहर को सास द्वारा बहू को सौंपने की परंपरा का निर्वाह पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।पंजाब में स्त्रियां कंगननुमा डिजाइन का एक विशेष पारंपरिक आभूषण पहनती है, जिसे लहसुन की पहुंची कहा जाता है।सोने से बनी इस पहुंची में लहसुन की कलियां और जौ के दानों जैसे आकृतियां बनी होती है। हिंदू धर्म में मगरमच्छ, हांथी, सांप, मोर जैसी जीवों का विशेष स्थान दिया गया है।उत्तर भारत में ज्यादातर स्त्रियां ऐसे पशुओं के मुखाकृति वाले खुले मुंह के कड़े पहनती हैं, जिनके दोनों सिरे एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।पारंपरिक रूप से ऐसा माना जात है कि सुहागिन स्त्रियों की कलाइयां चूड़ियों से भरी हानी चाहिए। यहां तक की सुहागन स्त्रियां चूड़ियां बदलते समय भी अपनी कलाई में साड़ी का पल्लू कलाई में लपेट लेती हैं ताकि उनकी कलाई एक पल को भी सूनी न रहे। ये चूड़ियां आमतौर पर कांच, लाख और हांथी दांत से बनी होती है। इन चूड़ियों के रंगों का भी विशेष महत्व है।नवविवाहिता के हाथों में सजी लाल रंग की चूड़ियां इस बात का प्रतीक होती हैं कि विवाह के बाद वह पूरी तरह खुश और संतुष्ट है। हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समद्धि का हरा रंग शादी के बाद उसके परिवार के समृद्धि का प्रतीक है।होली के अवसर पर पीली या बंसती रंग की चूड़ियां पहनी जाती है, तो सावन में तीज के मौके पर हरी और धानी चूड़ियां पहनने का रीवाज सदियों से चला आ रहा है। विभिन्न राज्यों में विवाह के मौके पर अलग-अलग रंगों की चूड़ियां पहनने की प्रथा है।तेरहवां श्रृंगार : अंगूठीशादी के पहले मंगनी या सगाई के रस्म में वर-वधू द्वारा एक-दूसरे को अंगूठी को सदियों से पति-पत्नी के आपसी प्यार और विश्वास का प्रतीक माना जाता रहा है।चौदहवां श्रृंगार: कमरबंदकमरबंद कमर में पहना जाने वाला आभूषण है, जिसे स्त्रियां विवाह के बाद पहनती हैं, इससे उनकी छरहरी काया और भी आकर्षक दिखाई पड़ती है।सोने या चांदी से बने इस आभूषण के साथ बारीक घुंघरुओं वाली आकर्षक की रिंग लगी होती है, जिसमें नववधू चाबियों का गुच्छा अपनी कमर में लटकाकर रखती है।कमरबंद इस बात का प्रतीक है कि सुहागन अब अपने घर की स्वामिनी है।पंद्रहवाँ श्रृंगारः बिछुवा पैरों के अंगूठे में रिंग की तरह पहने जाने वाले इस आभूषण को अरसी या अंगूठा कह जाता है। पारंपरिक रूप से पहने जाने वाले इस आभूषण में छोटा सा शीशा लगा होता है, पुराने जमाने में संयुक्त परिवारों में नववधू सबके सामने पति के सामने देखने में भी सरमाती थी। इसलिए वह नजरें झुकाकर चुपचाप आसपास खड़े पति की सूरत को इसी शीशे में निहारा करती थी पैरों के अंगूठे और छोटी अंगुली को छोड़कर बीच की तीन अंगुलियों में चांदी का विछुआ पहना जाता है। शादी में फेरों के वक्त लड़की जब सिलबट्टे पर पेर रखती है, तो उसकी भाभी उसके पैरों में बिछुआ पहनाती है। यह रस्म इस बात का प्रतीक है कि दुल्हन शादी के बाद आने वाली सभी समस्याओं का हिम्मत के साथ मुकाबला करेगी।सोलहवां श्रृंगार: पायलपैरों में पहने जाने वाले इस आभूषण की सुमधुर ध्वनि से घर के हर सदस्य को नववधू की आहट का संकेत मिलता है।पुराने जमाने में पायल की झंकार से घर के बुजुर्ग पुरुष सदस्यों को मालूम हो जाता था कि बहू आ रही है और वे उसके रास्ते से हट जाते थे।पायल के संबंध में एक और रोचक बात यह है कि पहले छोटी उम्र में ही लडिकियों की शादी होती थी और कई बार जब नववधू को माता-पिता की याद आती थी तो वह चुपके से अपने मायके भाग जाती थी। इसलिए नववधू के पैरों में ढेर सारी मंघरुओं वाली पाजेब पहनाई जाती थी।पैरों में ढेर सारी घुंघरुओं वाली पाजेब पहनाई जाती थी ताकि जब वह घर से भागने लगे तो उसकी आहट से मालूम हो जाए कि वह कहां जा रही है।पैरों में पहने जाने वाले आभूषण हमेशा सिर्फ चांदी से ही बने होते हैं। हिंदू धर्म में सोना को पवित्र धातु का स्थान प्राप्त है, जिससे बने मुकुट देवी-देवता धारण करते हैं और ऐसी मान्यता है कि पैरों में सोना पहनने से धन की देवीलक्ष्मी का अपमान होता है।वनिता पंजाब साभार

🚩🪴राष्ट्र हिन्दू 🪴🚩 करवा चौथ पर महिलायें सोलह श्रृंगार करती है, वह 16 श्रंगार की कौन से होते है? By  वनिता कासनियां पंजाब महिलाएं केवल करवा चौथ पर ही 16 श्रृंगार नहीं करती। भारत में महालक्ष्मी व्रत, दीपावली, विवाह आयोजन ओर शुभ मंगल कार्यों के दौरान भी 16 श्रंगार करती हैं। स्त्री जातक, स्त्री सुबोधनी, हरिवंश पुराण, श्रंगार शतक आदि पुस्तकों में स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक सोलह श्रंगारों की चर्चा की गई है। स्त्रियों के 16 श्रृंगार एवं उसका महत्व हिन्दू महिलाओं के लिए 16 श्रृंगार का विशेष महत्व है स्त्री के 16 श्रंगार 16 कला, ॐकार की 16 मात्रा ओर षोड़स मातृका का प्रतीक हैं। स्त्रियों के 16 श्रृंगार कौन से हैं विवाह के बाद स्त्री इन सभी चीजों को अनिवार्य रूप से धारण करती है। हर एक चीज का अलग महत्व है। हर स्त्री चाहती थी की वे सज धज कर सुन्दर लगे। यह उनके रूप को ओर भी अधिक सौन्दर्यवान बना देता है। श्रंगार से पूर्व महिलाएं हल्दी, केशर आदि का उबटन लगाकर शरीर की शुद्धि करती हैं। प्राचीन जाल में रानी, अमिरिन की पत्नियां कुंकुमादि तेल से शरीर की मालिश करती थीं। पहला श्रृंगार: बिंदी संस्कृत...

🚩🪴राष्ट्र हिंदू🪴🚩राष्ट्र हिंदू धर्म मेंमहर्षि मांडव्य - वो ऋषि जिन्होंने यमराज को भी श्राप दिया,माण्डव्य पौराणिक काल के एक महान ऋषि थे जिनके श्राप के कारण यमराज को भी मनुष्य का जन्म लेना पड़ा। वैसे तो यमराज सारे प्राणियों के कर्मों के आधार पर न्याय करते हैं इसीलिए उन्हें धर्मराज कहा जाता है किन्तु उन्होंने अनजाने में माण्डव्य ऋषि के साथ अन्याय किया जिसका दंड उन्हें भोगना पड़ा।महर्षि माण्डव्य भार्गव वंश के ऋषि थे और उनका एक नाम "अणीमाण्डव्य" भी कहा गया है। इनके विषय में कथा मत्स्य पुराण में दी गयी है। वे महर्षि मातंग और दित्तामंगलिका के पुत्र थे। उन्होंने अल्प आयु में ही बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कर ली और ऋषियों में सम्मानित हो गए। उनका एक व्रत था कि संध्याकाल के तप के समय वे मौनव्रत धारण किये रहते थे।एक बार कुछ लुटेरे लूट का बहुत सारा सामान लेकर भाग रहे थे। उनके पीछे कई राजकीय सैनिक लगे थे जिनसे बचने के लिए वे भाग कर माण्डव्य ऋषि के आश्रम में छिप गए। थोड़ी देर बाद जब सैनिक वहां आये तो उन्होंने माण्डव्य ऋषि से उन लुटेरों के विषय में पूछा। मौन व्रत के कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब जब सैनिक अंदर गए तो उन्हें लूट के सामान के साथ लुटेरे भी मिल गए। उन्होंने समझा कि ये ऋषि भी इनके साथ मिले हुए हैं इसी कारण वे लुटेरों के साथ ऋषि को भी पकड़ कर ले गए और राजा के सामने प्रस्तुत किया।राजा ने भी उनसे प्रश्न किया किन्तु मौन व्रत होने के कारण माण्डव्य ऋषि कुछ नहीं बोले। राजा ने इसे उनकी स्वीकृति समझा और सभी लुटेरों के साथ उन्हें भी सूली पर चढाने का आदेश दे दिया। सूली पर चढाने से अन्य लुटेरे तो तक्षण मर गए किन्तु माण्डव्य ऋषि अपने तप के बल पर कई दिनों तक बिना खाये-पिए जीवित रहे। शूल के अग्र भाग को "अणि" कहते हैं और तभी से वे "अणीमाण्डव्य" नाम से भी प्रसिद्ध हुए।जब राजा को इस चमत्कार के बारे में पता चला तो तो स्वयं नंगे पांव महर्षि के पास आये और उन्हें सूली पर से उतारा। फिर उन्होंने महर्षि से बारम्बार क्षमा मांगी। मांडव्य ऋषि ने ये सोच कर उसे क्षमा कर दिया कि राजा ने तो परिस्थिति के अनुसार न्याय किया। वे चुप-चाप वहां से चले गए। वे चले तो गए किन्तु एक बात उन्हें खाये जा रही थी कि उन्होंने कभी कोई पाप नहीं किया फिर किस कारण उन्हें ऐसा दंड भोगना पड़ा?इसका कारण जानने के लिए वे यमपुरी पहुंचे जहाँ यमराज ने उनका स्वागत किया। माण्डव्य ऋषि ने यमराज से पूछा कि उन्हें याद नहीं कि कभी उन्होंने कोई अपराध किया हो तो फिर किस कारण उन्हें ऐसा घोर दंड भोगना पड़ा? इस पर यमराज ने कहा - "हे महर्षि! बालपन में आपने पतंगों के पृष्ठ भाग में सींक घुसा दिया था जिस कारण आपको ये दंड भोगना पड़ा। जिस प्रकार छोटे से पुण्य का भी बहुत फल प्राप्त होता है उसी प्रकार छोटे से पाप का भी फल अधिक ही मिलता है।यह सुनकर माण्डव्य ऋषि ने यमराज से पूछा कि मैंने ये अपराध किस आयु में किया था? तब यमराज ने उन्हें बताया कि उन्होंने ये कार्य १२ वर्ष की आयु में किया था। इसपर माण्डव्य अत्यंत क्रोधित हो यमराज से बोले - "हे धर्मराज! शास्त्रों के अनुसार मनुष्य द्वारा १२ वर्ष तक किये कार्य को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्यूंकि उस आयु में उन्हें पाप पुण्य का ज्ञान नहीं होता। किन्तु तुमने बालपन में किये गए मेरे अपराध के कारण मुझे इतना बड़ा दंड दिया इसीलिए मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम मनुष्य योनि में शूद्र वर्ण में एक दासी के गर्भ से जन्मोगे।"तब यमराज ने उनसे प्रार्थना की तो उन्होंने उन्हें बताया कि अगले जन्म में वे सारे संसार में प्रसिद्ध होंगे। उसके अतिरिक्त माण्डव्य ऋषि ने एक नयी मर्यादा स्थापित की जिसमें उन्होंने आयु सीमा को बढ़ा कर १४ वर्ष कर दिया। अब १४ वर्ष तक के बच्चों को अपने किये आचरण के कारण दंड से अभय मिल गया। माण्डव्य ऋषि के श्राप के कारण ही धर्मराज द्वापर में महर्षि वेदव्यास की कृपा से अम्बा की दासी पारिश्रमी के गर्भ से विदुर के रूप में जन्में। वे अपने काल के महान राजनीतिज्ञ और हस्तिनापुर के महामंत्री बनें।माण्डव्य ऋषि के सन्दर्भ में एक और कथा का वर्णन आता है जो सती कौशिकी के सम्बन्ध में है। कौशिकी नाम की एक सती स्त्री थी जिनके पति का नाम कौशिक था जो अपंग थे। एक दिन रात्रि में वे कही जा रहे थे और अँधेरे के कारण वे तपस्यारत महर्षि माण्डव्य से टकरा गए जिससे उनकी तपस्या भंग हो गयी। इससे क्रुद्ध होकर माण्डव्य ऋषि ने कौशिकी को श्राप दे दिया कि अगले सूर्योदय पर वो विधवा हो जाएगी।कौशिकी अनेकों सिद्धों के पास गयी पर सभी ने माण्डव्य ऋषि के श्राप को विफल करने में असमर्थता दिखलाई। तब वे माता पार्वती की शरण में गयी जिन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से उन्हें बताया कि वे अपने सतीत्व की शक्ति का प्रयोग करे। सूर्योदय से कुछ समय पूर्व यमदूत कौशिकी के सम्मुख आ गए किन्तु उसने दसो दिशाओं को साक्षी मान कर कहा कि यदि वो सच में सती है तो अब सूर्योदय ही नहीं होगा। सूर्यदेव कौशिकी के सतीत्व की रक्षा के कारण रुक गए।सूर्य की गति रुकने से सारे जगत में हाहाकार मच गया। देव त्रिदेवों के पास गए जिन्होंने उन्हें माता अनुसूया से सहायता मांगने को कहा। तब देवों की प्रार्थना पर अनुसूया कौशिकी के पास आयी और उसकी सराहना करते हुए सूर्य को मुक्त करने को कहा। उन्होंने कौशिकी को विश्वास दिलाया कि वे उसके पति के प्राणों की रक्षा करेंगी। उनके आश्वासन पर कौशिकी ने सूर्य को मुक्त कर दिया।सूर्योदय होते ही यमदूत कौशिक के प्राण लेने को आगे बढे किन्तु माता अनुसूया के सतीत्व के कारण वे ऐसा नहीं कर सके। तब यमराज के अनुरोध पर माता अनुसूया ने अपने सतीत्व का कुछ भाग देकर कौशिकी को महर्षि माण्डव्य के श्राप से मुक्त कर दिया और कौशिक की रक्षा की। इस प्रकार संसार ने दो सतियों का प्रताप एक साथ देखा।बाल वनिता महिला वृद्ध आश्रम

🚩🪴राष्ट्र हिंदू🪴🚩 राष्ट्र हिंदू धर्म में महर्षि मांडव्य - वो ऋषि जिन्होंने यमराज को भी श्राप दिया , माण्डव्य पौराणिक काल के एक महान ऋषि थे जिनके श्राप के कारण  यमराज  को भी मनुष्य का जन्म लेना पड़ा। वैसे तो यमराज सारे प्राणियों के कर्मों के आधार पर न्याय करते हैं इसीलिए उन्हें धर्मराज कहा जाता है किन्तु उन्होंने अनजाने में माण्डव्य ऋषि के साथ अन्याय किया जिसका दंड उन्हें भोगना पड़ा। महर्षि माण्डव्य भार्गव वंश के ऋषि थे और उनका एक नाम  "अणीमाण्डव्य"  भी कहा गया है। इनके विषय में कथा मत्स्य पुराण में दी गयी है। वे महर्षि मातंग और दित्तामंगलिका के पुत्र थे। उन्होंने अल्प आयु में ही बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कर ली और ऋषियों में सम्मानित हो गए। उनका एक व्रत था कि संध्याकाल के तप के समय वे मौनव्रत धारण किये रहते थे। एक बार कुछ लुटेरे लूट का बहुत सारा सामान लेकर भाग रहे थे। उनके पीछे कई राजकीय सैनिक लगे थे जिनसे बचने के लिए वे भाग कर माण्डव्य ऋषि के आश्रम में छिप गए। थोड़ी देर बाद जब सैनिक वहां आये तो उन्होंने माण्डव्य ऋषि से उन लुटेरों के विषय में पूछा। मौन व्...